Hindi chapter 1 matribhoomi part 2 मातृभूमि ( हिंदी पाठ 1) part 2 फर्स्ट ईयर foundation
मातृभूमि
part 2
मैथिली शरण गुप्त कविता
संदर्भ अर्थ
मातृभूमि पार्ट 1 लिंक
पद्यांश
नीलांबर परिधान हरित तट पर सुंदर है
, सूर्य-चंद्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है। (रोला छंद)
नदियाँ प्रेम-प्रवाह फूल तारे मंडन हैं,
बंदी जन खग-वृंद शेष फन सिंहासन है!
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की। (उल्लाला)
संदर्भ:। प्रस्तुत पद्यांश द्विवेदी युगीन प्रसिद्ध महाकवि एवं राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त द्वारा रचित 'भारत भारती' के मातृभूमि नामक काव्य से लिया गया है।
शब्दार्थ- नीलांबर: नीला आकाश
- परिधान: वस्त्र
- युग :जोड़ा
- मेखला: करधनी
- रत्नाकर :समुद्र
- तारे मंडल :तारों का समूह
- बंदी जन: वंदना करने वाले
- खग: पंछी
- वृद्ध: समूह
- शेष फन : शेषनाग का फन
- अभिषेक: जलाभिषेक
- पायोद :बादल
- बलिहारी :प्राणी इच्छावर करना
- सर्वेश: परमपिता परमेश्वर
Notes - नीला आकाश(नीलांबर) मातृभूमि (भारत मां) का वस्त्र(परिधान) है
- सूर्य और चांद का जोड़ा(युगल) मुकुट है
- समुद्र(रत्नाकर),उनकी करधनी(मेखला) है
- तारों का समूह ,फूल है
- पंछी वंदना करने वाले बंदी जन है
- बादल आपका जलाभिषेक करते हैं
- मातृभूमि के सुंदर रूप पर बलिहारी जाने का अर्थात प्राण न्योछावर (आत्मसमर्पण) करने का मन करता है
- नीलांबर: नीला आकाश
- परिधान: वस्त्र
- युग :जोड़ा
- मेखला: करधनी
- रत्नाकर :समुद्र
- तारे मंडल :तारों का समूह
- बंदी जन: वंदना करने वाले
- खग: पंछी
- वृद्ध: समूह
- शेष फन : शेषनाग का फन
- अभिषेक: जलाभिषेक
- पायोद :बादल
- बलिहारी :प्राणी इच्छावर करना
- सर्वेश: परमपिता परमेश्वर
- नीला आकाश(नीलांबर) मातृभूमि (भारत मां) का वस्त्र(परिधान) है
- सूर्य और चांद का जोड़ा(युगल) मुकुट है
- समुद्र(रत्नाकर),उनकी करधनी(मेखला) है
- तारों का समूह ,फूल है
- पंछी वंदना करने वाले बंदी जन है
- बादल आपका जलाभिषेक करते हैं
- मातृभूमि के सुंदर रूप पर बलिहारी जाने का अर्थात प्राण न्योछावर (आत्मसमर्पण) करने का मन करता है
विशेष: प्रस्तुत पद्यांश में रोला एवं उलाला छंद है।
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मृतक-समान अशक्त विवश आँखों को मीचे;
गिरता हुआ विलोक गर्भ से हमको नीचे।
कर के जिसने कृपा हमें अवलम्ब दिया था,
लेकर अपने अतुल अंक में त्राण किया था।
जो जननी का भी सर्वदा, थी पालन करती रही।
तू क्यों न हमारी पूज्य हो? मातृभूमि, मातामही।
विशेष: प्रस्तुत पद्यांश में रोला एवं उलाला छंद है।
- मृतक: मरा हुआ
- अशक्त: शक्तिहीन
- मीच: बंद करना
- विलोक : विलोकना( देखना)
- अवलंब : सहारा
- अतुल अंक: अतुलनीय गोद
- त्राण : उद्धार , मुक्ति
- जननी: जन्मदायनी (माता )
- मातामही : नानी
- पितामह : नाना / दादा
Note
जब हम माता के गर्भ में कष्टों में तड़प रहे थे तब आप ने हीं हमें सहारा दिया और कष्टों से मुक्ति दिलाई।
मातृभूमि आपने मेरी माता को भी पाला पोसा है इसलिए आप मेरी माता की भी माता अर्थात मेरी नानी है।
जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुए है
घुटनों के बल सरक सरक कर खड़े हुए हैं।
परमहंस - सम बाल्यकाल में सब सुख पाए,
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाए।
हम खेले कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
हे मातृभूमि! तुझको निरख मग्न क्यों न हों मोद में?
शब्दार्थ
- रज: धूल
- परमहंस सम : परमहंस के समान
- धूल भर हीरे: धूल में खेलते हुए प्यारे-प्यारे हीरो के समान बच्चे हर्षयुत : खुशी के साथ
- निरख : देखकर
- मोद : खुशी
Notes
- हंस के समान बाल्यकाल में मोतियों के सुख पाए हैं
- बचपन में धूल भर हीरे कहलाए हैं
- आपकी गोद में प्रसन्नता पूर्वक खेला है
- आपको देखकर और पुरानी यादों को याद करके मन प्रसन्नता से मगन( मग्न) हो जाता है
पालन-पोषण और जन्म का कारण तू ही.
वक्षस्थल पर हमें कर रही धारण तू ही।
अभ्रंकष प्रसाद और ये महल हमारे
, बने हुए हैं अहो! तुझी से तुझ पर सारे ।
हे मातृभूमि! जब हम कभी शरण न तेरी पाएँगे,
बस तभी प्रलय के पेट में सभी लीन हो जाएँगे।
शब्दार्थ
- वक्षस्थल: सीने पर
- अभ्रंसक:आसमान छूने वाले
- प्रसाद: भवन
बदले में कुछ नहीं किसी से तू लेती है।
श्रेष्ठ एक से एक विविध द्रव्यों के द्वारा,
पोषण करती प्रेम-भाव से सदा हमारा।
हे मातृभूमि! उपजे न जो तुझसे कृषि-अंकुर कभी,
तो तड़प-तड़प कर जल मरें जठरानल में हम सभी 5 ||
शब्दार्थ
- जठरानल : भूख
पाकर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा.
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।
बस तेरे ही सुरस सार से सनी हुई है।
फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनाएगी,
हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जाएगी। ०६
जिन मित्रों का मिलन मलिनता को है खोता,
जिस प्रेमी का प्रेम हमें मुददायक होता।
जिन स्वजनों को देख हृदय हर्षित हो जाता.
नहीं टूटता कभी जन्म भर जिनसे नाता ।
उन सबमें तेरा सर्वदा व्याप्त हो रहा तत्त्व है
हे मातृभूमि! तेरे सदृश किसका महा महत्त्व है? 07
शब्दार्थ
- मलिनता: गंदगी , बुराइयां, दुख
- स्वजन: नाते रिश्तेदार, परिवार जन
निर्मल तेरा नीर अमृत के सम उत्तम है
, शीतल-मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है
षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है,
हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है।
शुचि सुधा सीचता रात में तुझ पर चंद्रप्रकाश है।
हे मातृभूमि! दिन में तरणि करता तम का नाश है। 08
शब्दार्थ
- षट्ऋतु: छह ऋतुएं ( ग्रीष्म, शीत, वर्षा, वसंत, शिशिर, हेमंत)
- शुचि: निर्मल, शुद्ध
सुरभित, सुंदर, सुखद सुमन तुझ पर खिलते हैं,
भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते हैं।
ओषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली
, खानें शोभित कहीं धातु-वर रत्नोंवाली।
जो आवश्यक होते हमें, मिलत सभी पदार्थ हैं.
हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं। 09
शब्दार्थ
- सुरभित: सुगंधित
- सुमन: पुष्प , प्रसून, फूल, कुसुम
- सुधोपम : अमृत से भी मीठे
- वसुधा: वसु (धन) देने वाली
- धरा: धारण करने वाली,
दिख रही है कही दूर तक शैल श्रेणी
कहीं घनावली बनी हुई है तेरी वेणी
नदियां पैर पाखर रही है बन कर चेरी पुष्पों से तरुराज कर रही पूजा तेरी
मृदु मलय वायु मानो तुझे चंदन चारु चढ़ा रही
हे मातृभूमि ! किसका ना तू सात्विक भाव बढ़ा रही ।
शब्दार्थ
- घनावाली: बादलों की श्रृंखला
- वेणी: चोंटी
- तरुराज: ऋतुराज वसंत
- मृदु : कोमल
- मलय : सुगंधित
- चारू: सुंदर
क्षमा मयी तू दयामयी है क्षेममयी है
सुधामयी , वात्सल्यमयी ,तू प्रेम मयी है
विभावशालिनी , विश्व पालनी , दुख हर्त्री है
भय निवारनी ,शक्तिकारिणी , सुख कर्त्री है
हे शरण दायिनी देवी तू करती सबका त्राण है
हे मातृभूमि संतान हम ,तू जननी ,तू प्राण है। 11
- क्षेममयी: सुख देने वाली
- विभवपालिनी: धन संपत्ति देने वाली
आता है उपकार, याद हे माता! तेरा,
हो जाता मन मुग्ध भक्ति भावों का प्रेरा।
तू पूजा के योग्य, कीर्ति तेरी हम गावें,
मन तो होता तुझे उठाकर शीश चढ़ावे ।
वह शक्ति कहाँ, हा! क्या करें, क्यों हम को लज्जा न हो?
हम मातृभूमि! केवल तुझे शीश झुका सकते अहो ! |12||
कारण-वश जब शोक-दाह से हम दहते हैं.
तब तुझ पर ही लोट-लोट कर दुख सहते हैं।
पाखंडी ही धूल चढ़ा कर तनु में तेरी
कहलाते हैं साधु नहीं लगती है देरी
इस तेरी ही सुवि धूलि में मातृभूमि! यह शक्ति है।
जो क्रूरों के भी चित्त में उपजा सकती भक्ति है ।।13।।
शब्दार्थ
- तनु: तन (शरीर) में
- सुवि: गर्म
- क्रूर: निर्दयी, अत्याचारी , कुकर्मी
कोई व्यक्ति विशेष नहीं तेरा अपना है,
जो यह समझे हाय! देखता वह सपना है।
तुझको सारे जीव एक से ही प्यारे हैं,
कर्मों के फल मात्र यहाँ न्यारे-न्यारे हैं।
हे मातृभूमि! तेरे निकट सबका सम संबंध हैं,
जो भेद मानता यह अहो! लोचनयुत भी अंध है।।14।।
शब्दार्थ
- लोचनयुत: आंख होते हुए भी
Notes
ओ मातृभूमि आप किसी के साथ भेदभाव नहीं करती
आपके लिए सब एक समान है । आप किसी के सुख और दुख का कारण नहीं हैं जो यह समझता है कि मातृभूमि किसी को सुख और किसी को दुख देती है वो लोग आंख होते भी अंधे हैं क्योंकि सुख और दुख मनुष्य को उसके कर्मों के आधार पर मिलते हैं
जिस पृथ्वी पे मिले हमारे पूर्वज प्यारे
उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे ।
लोट-लोट कर वहीं हृदय को शांत करेंगे,
उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे।
उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जाएँगे,
हो कर भव-बंधन मुक्त हम आत्मरूप बन जाएँगे ||15||
शब्दार्थ
- न्यारे: अलग
- आत्मरूप: स्वयं के वास्तविक रूप में (पंचतत्वों में)
Some other important points
मातृभूमि कविता के रचनाकार मैथिली शरण गुप्त हैं। यह कविता उनके खंड काव्य भारत भारती से ली गई है।
मातृभूमि कविता द्विवेदी युग में लिखी गई यह देशभक्ति की भावना से प्रेरित एक कविता है। कवि के अनुसार भारतवासियों की देह (शरीर) मातृभूमि अर्थात मिट्टी से बनी हुई है।
पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों से मातृभूमि सबसे निकट संबंध रखती है।
शतरंज के खिलाड़ी पार्ट 1 लिंक
आज के लिए इतना ही मिलेंगे अगले पोस्ट मे इसके सेकंड पार्ट में
धन्यवाद

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