Shatranj ke khiladi, Hindi chapter 2, part 2 शतरंज के खिलाड़ी

College and competition preparation

शतरंज के खिलाड़ी
Part 2

मुंशी प्रेमचंद

शतरंज के खिलाड़ी पार्ट 1 लिंक https://college-and-competition-preparation.blogspot.com/2023/10/1-2-imp-facts-and-points.html

हिंदी पाठ 1 मातृभूमि पार्ट 2 लिंक

(हिंदी इकाई 1
पाठ 2)

पढ़ाई शुरू करने से पहले यह बात कहना चाहता हूं कि फाउंडेशन को हल्के में नहीं लेना कुछ समय में आपके सीसी शुरू हो जाएंगे तब आपसे छोटे-मोटे प्रश्नों के हल भी नहीं बनेंगे अगर आप फाऊंडेशंस के चैप्टर को हल्की नजर से सरसराती हुई आंखों से भी देखते हैं तो आप उसमें अच्छा खासा स्कोर कर सकते हैं अर्थात आप उसको एक बार हल्के से एक नजर में पढ़ लीजिए कुछ ना कुछ तो दिमाग में जाएगा ही । फाउंडेशन का कोर्स वैसे भी टफ नहीं होता है उसमें केवल OMR शीट में MCQ आते हैं
 यदि आपने पाठ को केवल एक नजर में पढ़ लिया तो आपकी बहुत सारे डाउट और एमसीसी क्लियर हो जाएंगे उसमें ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं है पर इसका मतलब यह नहीं कि आप उसको एकदम से ही हल्के में ले, उसमें एक भी मेहनत ना करें , उसमे जरा भी ध्यान न दे
उसमें थोड़ा बहुत समय दीजिए वरना यह आपके भविष्य को, आपके रिजल्ट को खराब कर सकता है।

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शतरंज के खिलाड़ी प्रेमचंद की बड़ा प्रसिद्ध कहानी है यह कहानी व्यंग्य, रोमांच व शिक्षा से भरी पड़ी है।
यह कहानी बड़ी रोचक और दिलचस्प है पर बहुत बड़ी है इसलिए इसे संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
 शतरंज के खिलाड़ी का संक्षिप्त रूप में प्रस्तुतिकरण 

  प्रेमचंद द्वारा लिखित शतरंज के खिलाड़ी एक कहानी है जो कि इस प्रकार शुरू होती है:-
 वाजिद अली शाह का समय था जो कि अवध के शासक थे यह कहानी 1857 से पूर्व की है जब अंग्रेजी हुकूमत का शासन था । अवध साम्राज्य में लखनऊ विलासिता के रंग में बहुत बुरी तरह डूब गया था।  हर कोई नृत्य, शराब, आलस, शतरंज, हुक्का, अफीम, आमोद प्रमोद में बिका रहता
 शासन संचालन समाज की व्यवस्था, उद्योग धंधे सब कमजोर पड़ रहे थे। राज कर्मचारी विषय वासना में लिप्त रहते थे। बाहरी दुनियां में क्या हो रहा है किसी को खबर नहीं थी।

फकीरों को पैसे मिलते हैं तो वह रोटियां ना लेकर अफीम और मादक पदार्थ पीते।
लखनऊ में ही दो मित्र मीर एवं मिर्जा है। मिर्जा का पूरा नाम मिर्जा सज्जाद अली और मीर का पूरा नाम मीर रोशन अली है। दोनों यह समझते हैं की शतरंज खेलने से बुद्धि बढ़ती है और समय आसानी से व्यतीत हो जाता है इसलिए दोनों दिन भर शतरंज में व्यस्त रहते हैं।
प्रातः काल दोनों मित्र नाश्ता करके खेलने बैठ जाते हैं। मोहरे सज जाती हैं और दांव पेंच शुरू हो जाते हैं । फिर पता न चलता कि कब दोपहर हुई , कब तीसरा पहर और कब शाम । घर से बार-बार बुलावा आता कि खाना तैयार हो गया ।
 जवाब मिलता चलो आते हैं। पर वह खाना खाने नहीं जाते। फिर बावर्ची विवश होकर कमरे में ही खाना रख जाता।

मिर्जा सज्जाद अली के घर में कोई बड़ा बूढ़ा न था जो कि उन्हें इस काम को में टोकता। घर वाले ,बाहर वाले ,क्या नौकर भी उन पर टिप्पणियां किया करते कि बड़ा मनहूस खेल है ,घर को तबाह कर देता है ,खुदा ना करें किसी को इसकी लत पड़े। आदमी को दिन दुनिया की कोई खबर नहीं रहती, ना घर का रहता है ना घाट का ।

मिर्जा साहब की बेगम को भी बहुत बुरा लगता था इसलिए वह अवसर खोज-खोज कर पति से लड़ती थी ,उन्हें बोलती थी कि मत खेला करो लेकिन उन्हें समझाने के लिए बहुत ही कम अवसर मिलता । सुबह मिर्जा जी जल्दी से ही खेल खेलने के लिए चले जाते हैं और रात में बेगम के सोने के बाद आते हैं।
बेगम साहिबा अपना सारा गुस्सा नौकरों पर उतार देती।

उनके जी में आता कि वह अपने पति को खूब खरी कोटी सुनाएं पर उनके सामने बोलने की उनकी हिम्मत नहीं होती। बल्कि वह मीर साहब को मीर बिगाडू बुलाती थी क्योंकि मिर्जा जी बेगम से कहते हैं कि मीर साहब ही उन्हें शतरंज खेलने के लिए बुलाकर बैठा लेते हैं।

एक दिन बेगम साहिबा के सिर में दर्द होने लगा उन्होंने नौकर को मिर्जा साहब को बुलाने को भेजा पर मिर्जा साहब ने कहा अभी आते हैं और गए नहीं तो बेगम को बहुत क्रोध आया।

नौकर बार-बार जिक्र कर रहे थे कि चलिए बेगम साहिबा बुला रही हैं पर मिर्जा साहब खेल में बहुत व्यस्त थे क्योंकि वह दो-तीन चालों में जीतने ही वाले थे ।
पर मीर साहब ने जोर दिया कि जाइए, पहले सुन आइए कि बेगम साहिबा क्या कह रही हैं । मीर साहब के बार-बार समझाने के बाद मिर्जा साहब बेगम के पास जाते हैं।

बेगम ने मिर्जा को खूब डांट फटकार लगाई कि शतरंज में इतना व्यस्त रहते हो कि दुनिया की कोई खबर नहीं रहती तो मिर्जा ने कहा कि यह सब मीर के कारण होता है । मेरा तो खेलने का मन ही नहीं करता पर वह मेरे से उम्र में बड़े है ना , उनका भी मान रखना पड़ता है।

 तो पत्नी कमरे की ओर जाती है और शतरंज की सारी गोटिया उठाकर फेंक देती है । पर मीर साहब कमरे में नहीं थे वो बाहर खड़े थे। उन्होंने कमरे का हाल देखा और बेगम साहिबा का क्रोध देखा तो वह घर को रवाना हो लिए ।

बेगम ने मिर्जा को हकीम से दवाई लेने को भेजा ,पर मिर्जा मीर के घर में जाकर शतरंज की बाजी खेलने लगे।
वह महीनों लगातार मीर के ही घर में ठहरे रहते हैं और दिन भर शतरंज खेलते । मीर साहब की पत्नी उनके ऊपर गुस्सा नहीं करती थी बल्कि उन्हें दिन भर शतरंज खेलने के लिए प्रेरित करती कि , जाइए मिर्जा साहब के यहां शतरंज खेल आइए। जिस कारण से मीर साहब को भ्रम हो गया था कि उनकी पत्नी बहुत ही विनम्र और विनयशील है , जबकि असलियत में माजरा  कुछ और ही था।

एक दिन एक सिपाही घोड़े पर सवार होकर मीर साहब  को बुलाने आता है कि अंग्रेजी हुकूमत ने लखनऊ में चढ़ाई कर दी है इसलिए सैनिकों की जरूरत है। पर मीर साहब नौकरों से दरवाजा बंद करवा देते हैं और सिपाही को कहलवा देते हैं कि वह घर पर नहीं।

फिर मीर साहब को चिंता होने लगी कि कहीं हमें भी लड़ाई में शामिल न होना पड़े, हम भी कहीं मौत के घाट न उतार जाएं। इसलिए उन्होंने कहीं एकांत में, शहर से दूर चुपचाप खेलने का निर्णय किया। 
दूसरे दिन दोनों मित्र अंधेरे में घर से निकल पड़े, बगल में एक छोटी सी दरी दबाए, डिब्बे में गिलौरियां भरे,  गोमती पार एक पुरानी वीरान मस्जिद के खंडहर में (जो कि शायद नवाब आसफ उद्दौला ने बनवाया था) में चुपचाप डेरा जमा लेते हैं।

फिर क्या उन्हें भूख प्यास की भी चिंता ना रहती , दिन रात बस शतरंज खेलते रहते, कोई योगी भी समाधि में इतना एकाग्र नहीं होता होगा जितनी एकाग्रता से वो शतरंज खेलते हैं।

देश की राजनीतिक दशा भयंकर होती जा रही थी।
 कंपनी की फौज लखनऊ की तरफ बढ़ रही थी, एक दिन दोनों मित्र मस्जिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे । मिर्जा की बाजी कुछ कमजोर थी मीर साहब उन्हें मात् पे मात दे रहे थे।
तभी वो अंग्रेजी सिपाहियों को तोफ ले जाते हुए देखते हैं।
जब सिपाही चले जाते हैं तो फिर से नई बाजी शुरू करते हैं और उसमें रम जाते हैं।

इस बार मीर की बाजी कमजोर थी, तभी सेना फिर गुजरती है वह दोनों खंडहर में चुपके से बाहर का नजारा देखते हैं कि   अंग्रेजी सेना ने अवध के नवाब, वजीर वाजिद अली को गिरफ्तार कर लिया है। पर पूरे लखनऊ में कोई भी शोर शराबा, कोई भी मारपीट, कुछ नहीं हुआ था। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शांति से बिना खून बहे, बिना किसी हलचल के हुई ।

वास्तव में यह कोई अहिंसा नहीं थी जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं , बल्कि यह वो कायरपन था जिसमें लखनऊ की जनता, सैनिक, कर्मचारी, डरे दुबके घर के अंदर ऐस की नींद में मस्त थे और उसके राजा कैद में।

फिर क्या दोनों ने फिर नई बाजी शुरू कर दी इस बार मिर्जा की बाजी कमजोरी थी मिर्जा लगातार तीन बार हार चुके थे, चौथी बार का रंग भी अच्छा न था इसलिए उनका स्वभाव थोड़ा उग्रता पूर्ण होने लगा, वे चिड़चिड़ाने लगे।  उन्होंने मीर पर हार का गुस्सा उतरना शुरू कर दिया , अपशब्द कहना शुरू कर दिया , दोनों के बीच अप्रासंगिक बातें होने लगी।

 बात बढ़ गई दोनों ने अपनी तलवार निकाल कर युद्ध शुरू कर दिया। भले ही वो देश के लिए समाज के लिए ,अपने राजा के लिए अपने देश के लिए मरने को तैयार ना हो पर अपने निजी निजी और झूठे सम्मान में मर मिटने के लिए तैयार थे और लड़ाई शुरू हो गई दोनों ने दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ और आखिर में दोनों ही मर गए।

अंधेरा होने चला ,बाजी बिछी हुई थी, दोनों बादशाह (शतरंज के) अपने-अपने सिंहासन पर बैठे हुए मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे । चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था टूटी हुई खंडहर , गिरी हुई दीवारें और धूल धासरित मीनारें इन लाशों को देखती हैं और सर धुनती हैं।

                                                                                

शिक्षा
कभी-कभी मनुष्य ऐसी चीजों की लत लगा लेता है , उनके नशे का शिकार हो जाता है कि बस उसका मन उस चीज का गुलाम हो जाता है। वह अपनी सारी खुशी इसी में देखने लगता है वह नहीं जानता कि हमारा सुख और दुख हमारे अंदर है,
हमारी सोच पर निर्भर करता है। जिस प्रकार आज का मानव अपना सुख पैसे को मानता है, उसके लिए पैसा ही सब कुछ है पैसे की चिंता में दिन रात तनावपूर्ण रहता है , छोटी उम्र से ही वह चिंता करने लगता है । उसके पास कितना ही धन दौलत हो मध्यम वर्ग  , निम्न वर्गी , उच्च वर्गी सब को यही चिंता रहती हैं कि मेरे पास दौलत कम है । 
उसके पास दौलत हो ,या ना हो पर उसकी हमेशा इस बात का टेंशन रहता है कि मुझे इतना नुकसान हुआ , मुझे उतना नुकसान और इन्हीं तरह की विचारों में जीवन का असली आनंद नहीं ले पता । जबकि छोटी सी झोपड़ी में रहने वाला एक गरीब चैन की नींद सोता है जीवन का असली आनंद पाता है।
 अगर अच्छे नजरिए से देखा जाए , तो हम जीवन के हर क्षण , हर पल का आनंद ले सकते हैं , यही जीवन है कि हर क्षण में हर कण में आनंद को खोजना । 
वर्तमान समय में लोगों ने अपने सुख को दूसरे वस्तुओं पर आश्रित कर दिया है खुद को, अपने सुख को, दूसरे वस्तुओं का गुलाम बना लिया। जैसे कि कोई समझता है कि जब मेरे पास बड़ा सा घर होगा तभी मैं सुखी कहलाऊंगा, कोई समझता है कि मेरे पास जब बहुत दौलत होगी तब मैं सुखी होऊंगा, किसी का सरकारी योजना का पैसा नहीं आ रहा तो वह उस बात में दुखी है । 
कोई टेंशन और घबराहट में दुखी है, कोई पड़ोसियों की वजह से दुखी है , कोई इश्क में दुखी है । किसी ने अपने आप को नशे का गुलाम बना दिया, किसी ने अपने आप को शराब का गुलाम बना दिया, किसी ने अपने आप को लालच का, किसी ने क्रोध का , गुलाम बना दिया ।
उसके समस्त दुखों एवं सुखों कारण उसकी सोच है, उसका दृष्टिकोण है । मतलब उसके सुख और दुख खुद उससे ही उत्पन्न होते हैं, इसीलिए तो कहा गया है कि नजरे बदलेगी तो नजारे खुद बदल जाएंगे
 पाठ यही शिक्षा देना चाहता है कि किसी भी चीज में अपने आप को एकदम गुलाम मत बना लो ।

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आज की पोस्ट में इतना ही मिलेंगे अगली पोस्ट में नई जानकारी के साथ के साथ इसी पाठ के अगले part में।

धन्यवाद

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